प्रेम ढाई का अक्षर/हेमन्त पांडेय

प्रेम ढाई का अक्षर ही सही,
पर समझा न किसी ने सही |
प्रेम निस्वार्थ करो तो सही ,
प्रेम की परिभाषा यही है सही ||

तन पर जो रुके नहीं वो प्रेम है सही ,
मन से जो आगे बढ़े वही प्रेम है सही |
काया और माया का नहीं प्रेम है सही ,
काया और माया के जो ऊपर मिले वही प्रेम￰ है सही ||

प्रेम की परिभाषा अनंत है सही,
पर किसी ने एक को भी समझा नहीं |
मीरा , सूर , रैदास – कबीर प्रेम के हैं आदर्श सही ,
इनके भावों में दिखता है निस्वार्थ प्रेम का रूप सही ||

प्रेम ही भक्ति का है सूत्र सही,
प्रहलाद जैसा प्रेम किसी ने किया न सही |
मिल जाते है प्रेम से भगवान भी स्वयं ,
पर प्रह्लाद जैसा आह्लाद (प्रेम )किसी ने किया ही नहीं ||

बचपन खेल में जवानी मेल में,
बुढ़ापा झंझटों में प्रेम किसी ने किया ही नहीं |
सभी कहते है प्रेम से जी रहे है ,
मैंने किसी को कहते सुना ही नहीं की प्रेम से मर रहे हैं ||

हकीकत यही है मृत्यु से प्रेम किसी ने किया ही नहीं ,
मैं कवि (हेमन्त) कहता हूँ प्रेम मृत्यु – जीवन से है ऊपर कहीं |
जिसे प्रेम भक्ति के बिना जाना जा सकता नहीं ,
प्रेम ढाई अक्षर का है सही पर प्रेम की गहराई को मापा जा सकता नही ||

कवि – हेमन्त पाण्डेय (अमेठी )
9082747967

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *