जख्म दिलके हर किसीको ना दिखाना चाहिये
मुश्किलें हों लाख फिर भी मुस्कराना चाहिये

फिर सजालो इन लबो पे मोहब्बत के गीत तुम
चाहे गम हो या ख़ुशी बस गुनगुनाना चाहिये

हर किसी को चाँद तो मिलता नहीं संसार में
बन के दीपक अंधेरो में जगमगाना चाहिये

सिर्फ मरहम ही मदावा के लिये काफी नहीं
दर खुदा के सजदे में भी सर झुकाना चाहिये

जानता हूँ में सभी को बैर है हम से यहाँ
रिश्ते तो फिर भी मुहब्बत से निभाना चाहिये

पर परिंदों के भले ही आँधियों ने तोड़े हो
हौसले परवाज के तो ना गिराना चाहिये
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
आई – 11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड़ ( जबलपुर म,प्र, )
1/6/2017
मदावा – इलाज , उपचार