तू अगर मेरी हम सफर होती/लक्ष्मण दावानी

तू अगर मेरी हम सफर होती
फिर तो आसाँ मेरी डगर होती

प्यासे ना रहते हम मुहब्बत में
साथ गर मेरे उम्र भर होती

क्यूँ भटकते अंधेरे में तन्हा
रौशनी बनके जो नज़र होती

रातें कटती नहीं उदासी में
खुश नुमां मेरी हर सहर होती

हर दुआ में तू मेरी शामिल है
काश तुमको भी ये कदर होती

झूमती शामें तेरी बाहों में
हाथ जो मेरे ये कमर होती

हम बिछा देते तारे राहों में
राहे जो तेरी गर इधर होती
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
31/5/2017
आई – 11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड़ ( जबलपुर म,प्र, )

2 comments

    1. नावाजिशो का तहेदिल से शुक्रिया आदरणीय बहुत आभार

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *