हे जग पालक

भुजगशायी हे पद्मनाभ प्रभु,कब तक शांत रहोगे।
खल बल बढ़ने लगा पुनर प्रभु,फ़िर कब इन्हें दहोगे।।
अब तो चितवन खोलो प्रभु जी,द्वारे दीन खड़े हैं।
विप्र,धेनु,सुर,संतो को,फ़िर कब प्रभु चहोगे।।

जब तक प्रभु अवतार न लोगे, धर्मोंत्थान न होगा ।
जीव मूक बस बलि चढेंगे,दुर्गुण बलिदान न होगा।।
सच्चे,पक्के,परम पुजारी,हैं चुपचाप बेचारे।
धर्महीन धर्मोंपदेशक, को,कब तलक सहोगे।।

हर युग रहा रहेगा ऋणी,तुम्हारा हे जगपालक।
खेले गोद ब्रह्मांड तुम्हारे,जस माँ गोदी बालक।।
पाप,पुण्य पर भारी होकर,तांडव करता फिरता।
कब करुनामय होकर प्रभु जी,संतन हिये बहोगे।।

लोभ,झूठ,पाखंड ने ऐसा,डेरा जाल बिछाया।
भक्ति धर्म की साँसें मद्धम,हो रही दुर्बल काया।।
अट्टहास पग-पग करते,असुरों से धर्म बचा लो।
जय जय कृपानिधान अनिल प्रभु, कब खल दुर्ग ढहोगे ।।

सुप्रभातम्

पं अनिल
अहमदनगर महाराष्ट्र
8968361211