ग़ज़ल

हालात

मुश्किल हैं हालात जीने की क्या बात करें,
रोज़ लगें आघात, जीने की क्या बात करें।

भूखा पेट रोटी मांगे कोइ न समझे पीड़,
लुट रहे ज़ज्बात, जीने की क्या बात करें।

अपने भी बेगाने हो गये अब तो मेरे भाई,
छोड़ गये सब साथ, जीने की क्या बात करें।

सारे दुश्मन हो गये दोस्त रहा न कोई,
यह कैसी करामात, जीने की क्या बात करें।

प्यार करने बाले करने लगे है अब नफरत,
बदल गये ख्यालात, जीने की क्या बात करें।

मौत का पैगाम भी कब आ जाये क्या जाने
मिले जिन्दगी को मात, जीने की कया बात करें।

कोई न समझे दर्द देश में अब अपनी बहनों का,
लुटे अस्मत बलात, जीने की क्या बात करें।

मार काट क्यूं होती है अब धर्म के नाम पर,
निराश दिन देखें न रात, जीने की क्या बात करें।

सुरेश भारद्वाज निराश
धौलाधार कलोनी लोअर बड़ोल
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