लगी जो आग दिल में/लक्ष्मण दावानी

लगी जो आग दिलमें उसे बुझाना भी जरूरी है
गुजरे हुऐ वकत को भूल जाना भी जररूरी है

दिये हो जख्म जो गहरे मेरे दिल पर तूने साकी
कभी आकर इन्हें मरहम लगाना भी जरूरी है

मिटा ही लेते तेरी याद के हर इक निशाँ को हम
मगर ये हाथ दिल तक पहुँचाना भी जरूरी है

कभी यादे कभी बाते कभी मुलाकाते यूँ अपनी
बहुत कुछ है जिन्हें अब मिटाना भी जरूरी है

बहुत आसाँ है किसी जमीं पर मकाँ बना लेना
किसी के दिल में कोई घर बनाना भी जरूरी है

मुहब्बत तो सभी कर तेते है जमाने में मगर
भुलाकर शिकवे मुहब्बत निभाना भी जरूरी है
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
आई – 11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड़ ( जबलपुर म,प्र,

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