संस्कारों की गजब परिभाषा देख रहा हूँ !
न प्यार है न इंसानियत अजब तमाशा देख रहा हूँ !!
सोचता हूँ किस ज़माने में जी रहा हूँ !
लगता है आजाद देश में रहकर भी कैदखाने में जी रहा हूँ !!

संस्कारों की गजब परिभाषा देख रहा हूँ !
स्कूलों में व्यापार तो नौकरियों में घोटाले देख रहा हूँ !!
गजब हो रहा है मेरे देश के साथ यारों !
कही धर्म में ढोंगी बाबाओं को तो कही राजनीति में गन्दी सियासत देख रहा हूँ !!

संस्कारों की गजब परिभाषा देख रहूँ !
अपनों को पराया परायों को अपना होते हुए देख रखा हूँ !
माँ – बाप को बोझ बताकर वृद्धाआश्रम में छोड़ते हुए देख रहा हूँ !!
वाह रे इंसान में तेरी अजब इन्सानियत देख रहा रहा हूँ !!

संस्कारों की गजब परिभाषा देख रहा हूँ !
वस्त्रों की भरमार है फिर भी किसी नुमाइश की तरह अंगप्रदर्शनों को होते देख रहा हूँ !!
जहाँ पश्चिम में जाकर सूरज का भी अस्त हो जाता है वही लोगों को पश्चिमी सभ्यता को अपनाते देख रहा हूँ !
सच कह रहा हूँ भारत ज्ञान की भूमि को अज्ञान से सना देख रहा हूँ !!

संस्कारों की गजब परिभाषा देख रहा हूँ !
न शर्म है न हया लोगों को बत्तमीज होते देख रहा हूँ !!
सोने की चिड़िया है देश मेरा उसके भी सुनहरे रंगो को उड़ते देख रहा हूँ !
जब राजनीति राष्ट्रनीति नहीं बन रही तो मैं आजाद भगत सिंह और उन वीर शहीदों को पाकर भी खोते हुए देख रहा हूँ !!

संस्कारों की गजब परिभाषा देख रहा हूँ !
कवि हेमन्त हूँ मैं अपनी कलम से इक सच्चाई बयां कर रहा हूँ !!
मानव को मानवता से भटकते देखकर इंसानियत की प्रार्थना रहा हूँ !
संसार में सार से जियों असार के विष न पियों यही इक बात हर मानव से कर रहा हूँ !!

कवि – हेमन्त पाण्डेय ( अमेठी )
‎ 9082747967