🛎हम ही दिखाई देते हैं🛎

कल दो नेता आपस में,
बतिया रहे थे।
एक दूसरे को अपना,
दुखड़ा सुना रहे थे।

बोट मांगने जाओ,
तो सौ बातें सुनाते हैं।
एक बोट के बदले,
दस काम गिनाते हैं।

जैसे हम नेता नहीं,
इनके गुलाम हैं।
इन हालात में चुनाव जीतना,
कोई आसान काम है?

लगता है तुम कच्चे खिलाड़ी हो,
राजनीति में अनाड़ी हो।
दस दिन जनता को बहलाओ,
हरे सब्जबाग दिखाओ।

उनकी हाँ में हाँ मिलाओ,
पीने बालों को पिलाओ।
इस मूलमंत्र को अपनाओ
अच्छे बोटों से जीत जाओ।

फिर पाँच साल के लिए,
तुम्हारी जयकार हो जाएगी।
तुम निक्कमे हुए तो भी,
जनता हजूर कहकर बुलाएगी।

नोट जितने चाहो खाना,
कोटे परमिट सब पचाना।
थोड़े कष्ट से क्या घबराना,
फिर इन्हें पड़ेगा तेरा हुक्म बजाना।

भ्रष्टाचारी होकर भी तुम,
जनसेवक कहलाओगे।
काम निजहित में करोगे,
लोगों को राष्ट्र हित बताओगे।

जनता तुम्हारी हर बात को,
बिल्कुल सही मानेगी।
तुम्हें सच्चा देश भक्त,
और अपना हितैषी जानेगी।

अधिकारी तेरे आगे ,
पूछ हिलाएंगे।
जो चमचागिरी नहीं करेंगे,
बे बदल दिये जाएंगे।

यहां भी बचकर,
काम करना पड़ता है।
हमें खाता देख,
बिपक्ष बहुत सड़ता है।

उनको यदि सह भी लें,
लेखकों,पत्रकारों का क्या करें।?

ये शोर मचाते नहीं थकते हैं,
काफी अनाप शनाप बकते हैं।

जैसे सरकार का नहीं ,
इनका माल खा रहे हैं।
अब तो न्यायाधीश भी,
हम पर गुर्रा रहे हैं।

हम जांच कमीशन बैठाकर,
कितनी सफाई देते हैं।
इन सबको फिर भी,
हम ही दिखाई देते हैं।

गोपाल शर्मा
जय मार्कीट
काँगड़ा हि.प्र.।