बहुत खुद्गर्ज है ये जिंदगी….

बहुत खुद्गर्ज है ये जिंदगी
पल में यहाँ सब अपने पल में पराये

छोटी छोटी सबकी आशायें
तकलीफ बहुत दिखायें

रोज़ नई उम्मीद सबकी
हर उमीद फ़िर एक सपना

जंग है यहाँ हर पल
जीने के लिये अपनों का भी दर्द नहीं

पडोसी पडोसी से खुश नहीं
अपने अपनों से खुश नहीं

बहुत खुद्गर्ज है ये जिंदगी
पल में यहाँ सब अपने पल पराये

कोई दीवार बना रहा है
कोई दीवार तोड़ रहा है

पडोसी मुल्क हो या पडोसी राज्य
एकता की भक्ति सिर्फ किताबों में

रोज़ बहू बेटियों की अस्मत है लूटती
सालों तक कैस अदालत में पड़ी रहती

सुनामी का कहर हो या सूखा
बेरोज़गारी से कोई मरे या रहे भूखा

कोई जीत रहा है कोई हार रहा है
जीवन की हरित क्रांति के लिये हर कोई लड़ रहा है

बहुत खुद्गर्ज है ये जिंदगी
पल में यहाँ सब अपने पल में पराये

राम भगत