भीतर छिपे रावण का दहन कब/आशीष बहल

अपने अंदर के रावण का दहन कब

मूल्यों को धारण करने की प्रेरणा है श्री राम

महान संस्कृति, उच्च आदर्श, मूल्यों से परिपूर्ण शिक्षा, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत , मन में वसी उत्तम मर्यादाएं और भी न जाने क्या क्या छिपा है हमारे भारत की इस पावन धरा में। ये वही महान देश है जंहा औरत को देवी, धरा को माता तथा संसार के हर प्राणी में देवता के समान दर्जा दिया गया है। परंतु विंडबना ये है कि आज भारत देश अपने इन वहुमूल्य विचारों को भूलता जा रहा है। हर वर्ग में हर जगह नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है। ये वही वीरों की धरती है जिन्होंने अपने लहू से सींच कर इस पावन धरती माता पर आज़ादी के फूल खिलाए हैं और आज हम उन सबको ताक पर रख कर आज़ादी के इन पलों को अपनी अज्ञानता से नष्ट कर रहे हैं। आज वही औरत जो कभी देवी की तरह पूजनीय थी आज सड़को में चीख रही है और न्याय की भीख मांग रही है वही औरत जो संसार की पालक है , माता है आज अपने आपको सुरक्षित महसूस नहीं करती। संस्कारो को रिश्तों को तार तार कर के आज देवी समान औरत को अपनी हैवानियत का शिकार बनाया जाता है। प्रश्न उठता है कि आखिर ये मूल्यों का पतन हुआ कैसे क्यों आज औरत अपने ही घर में सुरक्षित नहीं। 

कहने को तो आज हम बुराई के प्रतीक रावण को जलाने जा रहे है परंतु हम किस रावण को जलाने जा रहे हैं एक बार खुद से प्रश्न अवश्य करें उस महा ज्ञानी रावण को उस वेदों के ज्ञाता रावण को जिसने माता सीता का हरण किया पर अपनी मर्यादाओं को कभी नहीं लांघा और उस बुराई के प्रतीक रावण को तो हम जला सकते हैं पर उस रावण का क्या जो आज हमारे समाज के अंदर पल रहा है और यकीन मानिए ये रावण उस रावण से बहुत ही अधिक पापी, अधर्मी और विनाशक है। इसलिए आज आवश्यकता है एक ऐसे मर्यादा पुरुषोत्तम राम की छवि को अपने अंदर धारण करने की जो हमारे भीतर पल रहे रावण का वध कर सके।
आज उस रावण के दहन की आवश्यकता है जिसने हमारे संस्कारो का, मर्यादाओं का हरण किया है। आज बेटा माँ – बाप को बोझ समझ रहा है। भाई भाई का दुश्मन है ये जो देश कभी विश्वास करता था “वासुदेव कटुम्बकम” पर आज अपने परिवार को अपने कुटुंब को बचाने में संघर्ष कर रहा है। देश की युवा पीढ़ी नशे के कुचक्र में ऐसे फंसी है कि मानो बस अब अपना पूरा जीवन नशे को समर्पित कर दिया हो। आये दिन ऐसी ऐसी खबरें सुनने को मिलती हैं कि पांव तले जमीन खिसक जाये। हर तरफ खून खराबा समाज की सभी मर्यादाओं को लाँघ कर संस्कारो को ताक पर रख कर समाज आज भारत माँ का सीना चीरता हुआ दुष्चक्र के मार्ग पर चल रहा है। ये जो हमारे संस्कार दिन प्रतिदिन हमारा साथ छोड़ रहे हैं ये हमारे समाज को गर्त की और ले जाएंगे और समय का राक्षस इस कद्र सामने खड़ा हो जायेगा हम सब उसके ग्रास बन जायेंगे। अभी समय है कि हम अपने बच्चो को राम भगवान के समान बनाएं उनके आदर्शों पर चलने के लिए प्रेरित करें। राम कोई धर्म का अनुसरण नहीं है ये जीवन के मूल्यों को , संस्कारो को अपने अंदर उतारने का एक मार्ग है और इस मार्ग पर चल कर भारत का हर बच्चा अपने आने वाले जीवन को सुखी बना सकता है।
नवरात्रो पर भारत के कोने कोने में रामलीला का मंचन किया जाता है ये एक बेहतर तरीका है अपने अंदर के राम को जगाने का परन्तु समय के साथ साथ रामलीला भी अब आस्था कम और मनोरंजन का साधन अधिक हो गयी है ये एक चिंता का विषय बनता जा रहा है । यदि हम ईमानदारी के साथ अपनी आने वाली पीढ़ी को अपनी महान संस्कृति हस्तांतरित करना चाहते हैं तो आवश्यकता है कि हर बच्चे को राम से अवगत करवाएं और हर बेटी को माता सीता जैसी चरित्रवान बनाएं। आज जो मूल्यों का पतन बढ़ रहा है उसका मुख्य कारण है अपनी महान विरासत और संस्कृति से दूर जाना। आज बच्चे की शिक्षा व्यवस्था में भारी बदलाव आया है बच्चो को नैतिक मूल्यों की शिक्षा से कोसों दूर कर दिया गया है । अपने देश के महान विचारकों से अलग पाश्चात्य संस्कृति का जहर आज समाज के बीच घोला जा रहा है। हमारी संस्कृति हमें शिक्षा देती है भजन कीर्तन की, हमारी संस्कृति हमें सिखाती है तहजीब। पब या डिस्को में जाना हमारी संस्कृति का हिस्सा कभी नहीं रहा। बहुत से पाश्चात्य संस्कृति के पैरोकार मेरी इस बात का समर्थन नहीं करेंगे और विकास की दुहाई देकर इसे नैतिक मूल्यों का पतन न मानते हुए विकास का रास्ता बताएंगे। यदि मैं साफ़ शब्दों में कहूँ तो नहीं चाहिए वो रास्ता जो हमे अपनी संस्कृति से दूर करें जिसमें संस्कारों की तिलांजलि दी जाये। हमे ऐसे विकास को नहीं देखना जो बच्चो को माता पिता से दूर कर दे और देश को अपनी वहुमूल्य विरासत से अलग कर दे। इतिहास गवाह रहा है कि भारत देश ने बहुत से आक्रमणकारियों से लेकर गुलामी तक की पीड़ा को सहा है परंतु कभी अपने मूल्यों से समझौता नहीं किया चाहे जो मर्जी मुश्किलें रही हो देश की अखंडता को कभी खण्डित नहीं होने दिया।

 यही कारण है कि हम बड़ी शान से कहते हैं कि ” रोम मिस्र मिट गए इस जंहा से कुछ तो बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी” ।

 जबकि आज, देश के वीर सिपाही जब अपनी मातृभमि के लिए जान दे देते हैं और हम , हम उनसे सबूत मांगते हैं। हद है ऐसी मानसिकता की, कैसा समाज आज तैयार हो रहा है क्या हमारे मूल्य इतने गिर सकते हैं क्या व्यक्तिगत हित आज देशहित से बड़ा हो गया। क्या आज देश का वीर सिपाही अपनी शहादत का और दुश्मन की मौत का हिसाब देता फिरेगा ,अफ़सोस और शर्म आती है ये सोच कर कि आखिर हम कंहा जा रहे हैं क्यों इतना महान देश जो किसी समय में विश्वगुरु कहलाता था आज इतना मजबूर है। जब विश्व के अन्य देश अज्ञानता के अंधकार में डूबे थे तो हमारे भारत वर्ष में अपना विश्विद्यालय था तक्षशिला विश्वविद्यालय जंहा गर्व से पढ़ाया जाता था, भारत की संस्कृति को देश से हो या विदेश से हर किसी को हमारे वेदों का ज्ञान दिया जाता था हर कोई नतमस्तक होता था भारत की इस महान धरती पर क्योंकि यंहा हर मन में राम वस्ता था हर कोई ख़ुशी से गुनगुनाता फिरता था कि

चन्दन है इस देश की माटी, तपोभूमि हर ग्राम है।

हर बाला राधा की मूरत बच्चा बच्चा राम है।”

आज आखिर हम चुके कंहा ये जानना परम आवश्यक है क्यों हम अपने बच्चो को वो शिक्षा नहीं दे पा रहे जो इनका हक है। हमने गुरुकुल की शिक्षा प्रणाली से आज की मॉडर्न शिक्षा के सफर को तय किया है। गुरुकुल हमारी मुख्य सांस्कृतिक विरासत थे जंहा संस्कारी छात्र तैयार किये जाते थे। जिस सर्वांगीण विकास को हम अपनी शिक्षा प्रणाली में आज ढूंढ रहे हैं उस समय एक गुरु के द्वारा एक ही जगह पर करवाया जाता था। छात्र संस्कारो के साथ शास्त्रों और शस्त्रों का भी ज्ञाता बनता था । यदि हम बच्चो के भविष्य को संवारना चाहते हैं तो हमे अपनी ताकत को पहचानना होगा। देश की समृद्ध संस्कृति को सामने लाना होगा अपने अंदर के रावण को मारना होगा। बुराई पर अच्छाई की इस जीत में अपने अंदर के रावण का दहन करना अति आवश्यक है जो दिन प्रतिदिन हरण कर रहा है हमारे संस्कारो का।

 अब हर मन में राम को वसाना होगा, बस गया है जो रावण हृदय में उस रावण को जलाना होगा।

 और ये सही समय है आओ हम मिल कर प्रण ले कि विजयदशमी के इस पावन अवसर पर हम अपने अंदर के शैतान पर विजयी पायँगे। हमारे समाज में फ़ैल रही बुराई को , लगातार हीन हो रहे मूल्यों को बच्चो से दूर होती नैतिक शिक्षा को हम पुनः जागृत करेंगे। यही हमारी विजय होगी और ऐसी विजय जो समाज की दशा को सुधार कर सही दिशा प्रदान करेगी। आओ मिल कर संकल्प ले बुराई के प्रतीक रावण को अपने अंदर से भी जला डालें।

आशीष बहल


चुवाड़ी जिला चम्बा

Ph 9736296410

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