हास्य रचना …..

मूर्ख सम्मेलन

पिछले वर्ष एक लोक सहित्य परिषद ने मूर्ख सम्मेलन मनाया
हमारे यहां से भी एक मूर्ख चाहिये था
सो सोच समझकर हमें बुलाया।

हम पहुंचे तो हाल खचाखच भर गया था
जिसको जहां जगह मिली
बह बहीं पसर गया था
हम भी अंदर बड़े
दरबाजे में थे कुछ लोग खड़े
धक्का मुकी हुई हमें रोक लिया।
एक ज्यादा ही सज्जन था
उसने हमारे मुंह पर एक जोरदार
ठोक दिया।
हम ठहरे बापू के चेले
दूसरी साईड उसकी ओर घुमाई
कहा एक और लगा ले मेरे भाई
बह बोला मजाक करता है
बहाने से अंदर बड़ता है।
ले एक और..
चला दूसरा दौर
तभी एक आयोजक आया
बह हमें अंदर लाया
बैंच नुमा तख्ते पर विठाया।

हमने संयोजिका से कहा बहना!
क्या कुर्सियों का आकाल पड़ गया है
पता नहीं किस लकड़ी का फट्टा
मेरे नीचे धर दिया है
क्या अजीव फट्टा है, सुसरा नर्म तो होता
शरीर में गढ़ गया है।

संयोजिका बोलीं “निराश” जी
चिन्ता मत कीजिये
बैठने का मज़ा लीजिये,
फट्टा जितना सख्त होगा
कविता उतनी स्टराँग आयेगी
आप जितना हिलेंगे
जनता उतनी ही ताली बजायेगी।

क्या करते बैठ गये
कवितायें सुनते रहे
फट्टा चुभ रहा था
दायें बायें हिलते रहे
अति हो गयी तो
उठने बैठने लगे
लग रहे थे ठगे ठगे।

संयोजिका बोलीं
कृपया बैठ जाईये
अपने साथ साथ
जिले का नाम भी
बदनाम मत करबाइये।
बारी आने पर आपको
जरुर बुलायेंगे
आप से कविता जरुर पढ़बायेंगे।
इधर हमारी जान जा रही थी
और बह जिला बचा रही थी।

हमने कहा कम्बख्त यहि तो मुसीवत है
बारी कब आयेगी ?
जब फट्टे की चुभन,
एग्ज़िमा हो जायेगी?

देखो महोदया!
बारी का ईन्तज़ार करते करते,
हमें कवितेरिया हो गया है
और फट्टे की चुभन खुजाते खुजाते
हमें खुजलेरिया हो गया है
पता नहीं आपने कहां लाकर बिठा दिया
खुद को खुजाते खुजाते थक गये,
तो बगल बाले को खुजा दिया।

संयोजिका बोलीं
आपका अंदाजे व्यां कैसा है
ज़रा देखिये तो सही
बगल में कौन बैठा है?
हमने नज़र घुमाई
फिर गयी हमारी ऐसी की तैसी
देखा तो बगल में
एक कवियत्री थी बैठी
हमारे हाथ पैर फूल गये
उनसे नज़र क्या मिली
हम कविता ही भूल गये
हमने साष्टांग किया और कहा
मैडम ! अनजाने में हुई,
गल्ती के लिये क्षमा कीजिये,
बह बोलीं “निराश”जी क्षमा किसलिये
अपना ही कार्यक्रम है,
अगले वर्ष फिर दर्शन दीजिये
हमने दिल में सोचा, हमें कुर्सी नहीं चाहिये
हमें फट्टे पर ही बिठाईये।

सुरेश भारद्वाज निराश
धौलाधार कलोनी लोअर बड़ोल
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