जामे गम लिख दिये जो नाम पे रोनाआया
उस चमन के हि दरो बाम पे रोना आया

दे गये रंग कई रंगे हिना के जुगनू
अपने ही इश्क के अंजाम पे रोना आया

सामने आते तो कुछ और हि बातें होती
जो भेजा तुम ने उस पैगाम पे रोना आया

बिजलियाँ खुदपे गिराने से मिलेगा ही क्या
जो पिलाते थे लबो जाम पे रोना आया

कर न पाये बे वफाई जो कभी तुम से हम
बे वफा के तेरे इल्जाम पे रोना आया

जिस मुहब्बतको सराहा थाकभी तुमने भी
उस मुहबत के बेहद गाम पे रोना आया
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
28/5/2017
आई – 11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड़ ( जबलपुर म,प्र, )