रफ्ता -रफ्ता कदम लिये जा रहे मौत की ओर

एक दिन गूंजेगा मेरे लिए लिए राम नाम सत्य का शोर
तमाशा बन जाऊंगी मैं माटी की काया

नया खेल देखने होगी भीड़ चारों ओर
तर्क विर्तक करते रोते हंसते द्वेष ईष्या में बीतता जीवन

साथ जाता बस पाप पुण्य कर गौर
दौड़ते रहे जीवन भर ना जाने किन अंधेरे रास्तों में

भौतिक सुख आधुनिकता प्रतिस्पर्धा की झूठी दौड़
राहें दिखीं सतरंगी वहाॅ चल दिये इतराते

क्या पता था मौत खड़ी थी जहाॅ वो था अंधा मोड़
क्षणभंगुर काया पुतला माटी का टूटकर बिखरा

डोर टूटी साॅसो की जिनको वक्त के हाथ ने जकड़े
विदाई बेला बाॅस, फूस ,घी, काठ ,चंदन ,कफन का श्रृंगार

शाश्वत सत्य यही माया काया सब पराए हुए अपने
तप्त जिस्म अग्नि स्नान बनती क्षण- क्षण राख

फूल बनी अस्थियाॅ अंतिम यात्रा थी प्रयाग
स्नेहलता ‘स्नेह’

सरगुजा छ0ग0