किया तुमने जो गर इशारा न होता
तेरे सजदे में दिल हमारा न होता

सदा रहते तन्हाइयों में यहाँ हम
तेरे प्यार का गर सहारा न होता

खयालो में ही उलझे रहते सदा हम
अगर तुमने हमको पुकारा न होता

समझ ही न पाते मुहब्बत तेरी हम
मिला साथ जो ये तुम्हारा न होता

कदम दर कदम खाते ठोकर यहाँ पे
कहीं फिर हमारा गुजारा न होता

बिखर जाते तिनको के जैसे गमो में
मिला इश्क में जो किनारा न होता
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
27/5/2017
आई – 11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड़ ( जबलपुर म,प्र, )

इस कदर अपनी अदाओं से सताना छोड़ दो
चाँद से मुखड़े को आँचल में छुपाना छोड़ दो

क़त्ल हो जायेंगे तेरी इक मुस्कराहट से हम
तीर निगाहों से अपनी यूँ चलाना छोड़ दो

शौक ही है गर हमें तरसाने का तुमको अना
तो मेरे ख्वाबो खयालो में यूँ आना छोड़ दो

कहदे झूठी थी रिवायतें सब मुहब्बत की तेरी
हर वकत यूँ तुम हमको आजमाना छोड़ दो

डूबना ही है लिखा किस्मत में पाकर किनारा
पार खुदाया किश्ती को मेरी लगाना छोड़ दो

तुम्हे जब चाहत नहीं हमको गले लगाने की
फिर हमको पास अपने यूँ बिठाना छोड़ दो
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
आई – 11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड़ ( जबलपुर म,प्र, )