दर्द-ऐ-दिल तुम किसी के/लक्ष्मण दावानी

दर्द-ऐ-दिल तुम किसीके तो यहाँ पहचान लो
गिर गया इंसान ,के ओहदे से अब इंसान लो

क्यूँ सताते हो मुहब्बत में मेरी जाँ अपने तुम
हम लुटा देंगे किसी दिनजान तुझपे मान लो

हर सितम हम को गवारा है मुहब्बत में तेरी
मिल के ना मेरे रकीबो से मेरी तुम जान लो

सारे गम पलकों पे अपनी मैं सजा लूँगा तेरे
सर झुका कर गैरके शाने पे ना अहसान लो

क्यूँ कभी जज्बात मेरेही समझ ना पाये तुम
मैंने कदमो में तेरे अपनी बिछा दी आन लो

हर कदम सजदे करूँगा मै मुहब्बत के तेरी
मान रक्खा दिलने मेरे तुम्हेअब भगवान लो
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
24/5/2017
आई – 11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड़ ( जबलपुर म,प्र, )

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