तुम भी उधर जा रहे/संजीव सुधांशु

गजल
तुम भी उधर जा रहे हो जिधर सारे जा रहे हैं,
हम तो सुनसान नदी के किनारे जा रहे हैं |
विरान आज चमन है, दूर हमसे बहार,
यहां नजरों से रूठकर नजारे जा रहे हैं |
शाम होते ही शमा जल उठी महफिल में,
जलने वहां परवाने भी बेचारे जा रहे हैं |
ज़िन्दगी के मोड पर चल दिये हमें छोड़ कर,
तन्हा हम भी तकदीर के सहारे जा रहे हैं |
तलाश में तुम्हारी हमने जीस्त है गुजारी,
अब खाक भी छानने नसीब के मारे जा रहे हैं |
हम वही, हमारा दिल वही, वही हमारी मुहब्बत,
मरते दम तक लव नाम तुम्हारा पुकारे जा रहे हैं |
अंग्रेजी के पीछे भागती इस दुनिया में,
सुधांशु हम तो हिन्दी पे ही वारे जा रहे हैं |
संजीव कुमार सुधांशु
गांव व डाकघर च्वाई
त. आनी जिला कुल्लू (हि. प्र.)
94182-72564
70188-33244

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