पहलूमें हर किसी को बिठाया न कीजिये
आँखों से जाम अपने पिलाया न कीजिये

बे दर्द हैं बड़ी तेरी कातिल निगाहें ये
नज़रो से तीर दिल पे चलाया न कीजिये

किससे करें शिकायते ज़ुल्मो कि तेरे हम
जुबाँ पे नाम गैर का लाया न कीजिये

सदके तुमारे जान के हमने किये अदा
गैरो से मिल के हमको हराया न कीजिये

तुम से छुपी नहीं रुदादे ज़िन्दगी मेरी
नज़रो से अपने हमको हटाया न कीजिये

बे दर्द इस जहाँ ने सताया बहुत हमें
होकर खफा यूँ हम से रुलाया न कीजिये
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
20/5/2017
आई – 11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड़ ( जबलपुर म,प्र, )

दिलो के दर्द का कोई सहारा क्यों नहीं होता
भरी दुनिया में कोई भी हमारा क्यों नहीं होता

तड़फती आरजू भी दे रही रो रो सदाएँ अब
निगाहों में मेरी कोई नजारा क्यों नहीं होता

मुहब्बत उम्र भर यूँ कसमसाती ही रही दिल में
मुहब्बत का मेरी कोई किनारा क्यों नहीं होता

भटकता ही रहा हूँ अंधेरो में अर्से से हम दम
दिखादे राहें मंजिल जो सितारा क्यों नहीं होता

नहीं है जब लिखी मेरे नसीबो में मुहब्बत फिर
मुहब्बत के बिना मेरा गुजारा क्यों नहीं होता

बसा है दिल में मेरे इस कदर हुस्नो जमाले जो
निगाहों से मेरी उसका उतारा क्यों नहीं होता
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
22/5/2017
आई – 11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड़ ( जबलपुर म,प्र, )