नमस्कार … प्रस्तुत है एक नई रचना… ईर्ष्या… यह एक ऐसा शब्द है जो मानव के खुद के जीवन को तहस- नहस कर देता है। हमें दूसरों की खुशियाँ देख खुद के जीवन को ईर्ष्या की आग में नहीं जलाना चाहिए। रचना पढ़ने के लिए वक्त ज़रूर निकालें।

‘ईर्ष्या’

दूसरों की उन्नति देख,
पीड़ा मन में भर जाती।
ईर्ष्या है अग्न ऐसी,
जो खुद ही को भस्म है कर जाती।
न बनना बेदर्द यारो,
दर्द से बड़ा तड़फाती है ईर्ष्या।
दूसरों का बुरा सोचने से,
खुद ही को जलाती है ईर्ष्या।।

लेती है जन्म ईर्ष्या,
दूसरों को सुखी देखने पर।
मर्ज़ यह होता है ठीक,
दूसरों को दुखी देखने पर।
बुरा है होता बेकरारी का सबब,
करार बहुत बढ़ाती है ईर्ष्या।
दूसरों का बुरा सोचने से,
खुद ही को जलाती है ईर्ष्या।।

जब तक न हो बुरा होनहारों का,
तब तक करार आता नहीं।
ईर्ष्या है वो पानी का दरिया,
जो प्यास बुझाता नहीं।।
सींचना सभी पर अमृत सी खुशबू,
ज़हर का घूँट पिलाती है ईर्ष्या।
दूसरों का बुरा सोचने से,
खुद ही को जलाती है ईर्ष्या।।

दूसरों का संतोष हासिल करने की,
मन में एक चाह है रहती।
हावी खुद पर होते अंह अनिद्रा स्वार्थ,
नकारात्मकता दिल में बेपनाह है रहती।।
न रूलाना खुद को दिल से,
अश्रु आँखों में सुखाती है ईर्ष्या।
दूसरों का बुरा सोचने से,
खुद ही को जलाती है ईर्ष्या।।

ईर्ष्या को अरे ओ मानव,
तू गले लगाता क्यों?
दूसरों की तरक्की देख,
कलेजा अपना जलाता क्यों?
रहना संतुष्ट थोड़े में ही ‘भारती’ तू,
उम्र भर सताती है ईर्ष्या।
दूसरों का बुरा सोचने से,
खुद ही को जलाती है ईर्ष्या।।

रचनाकार– सुशील भारती, नित्थर, कुल्लू