चलती मेरी पेश अगर तो।
करती दुनिया ऐश मगर तो।।

होते ना दुखदाई किस्से।
मनभाती हर एक खबर तो।।

बच्चों को ना पढ़ना पड़ता।
ना ही होता जोरजबर तो।।

खेल-खिलौने जीवन होता।
करते मस्ती जी भरकर तो।।

आॅफिस की ना टेंशन होती।
छपते नोट सभी के घर तो।।

रिश्तेदार सभी खुश रहते।
जाता मैं मूरख भी तर तो।।

बूढ़े भी परवश ना होते।
रहती सीधी ठीक कमर तो।।

पंछी पेड़ सभी बतयाते।
गिरते ना पत्ते झरझर तो।।

गाय खुँखार अगर हो जाती।
दूध पिलाते शेर-बबर तो।।

मौत किसी की भी ना होती।
हो जाते सब अजर-अमर तो।।

पत्नी पति ना दुर्जन होते।
कहता कौन किसे काफ़िर तो।।

धर्मों का लफड़ा ना होता।
एक सभी भजते रहबर तो।।

कोई भी सरकार न होते।
हो जाते मालिक वोटर तो।।

भीर नहीं पड़ती भक्तों पर।
वन जाते काहे रघुवर तो।।

झूठ कपट का बोध न होता।
बिक जाते ना हरिचंदर तो।।

मानव सीधा मानव बनता।
ना बनता पहले बंदर तो।।

दास ‘नवीन’ ग़ज़ल कहता ना।
जाते व्यर्थ नहीं अक्षर तो।।

नवीन शर्मा
गुलेर-कांगड़ा
176033
?9780958743