माँ /डॉ राधिका भारद्वाज

मां
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डा.राधिका गुलेरी भारद्वाज
न शब्दों में बंधित तुम,
न पंक्तियों में वर्णित हो।
बुझती सांसें करता चेतन,
मां!शिशु को तुम वह अमृत हो।।
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सागर से ज़्यादा गहरी,
और उसमें हर मन रमता है।
अति सुन्दर और अति शीतल,
मां! तेरी वह इक ममता है।।
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शिशु को शिशु से बेहतर जाने,
अनकथ पीड़ा को पहचाने ।
विस्मित करता जिस का धीरज,
मां, ईश्वर की वह रचना है ।।
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अपनों ने है जब दर्द दिया,
मां ने उसको भी सहज पिया ।
ग़र मिथ्य लगे आरोप कभी,
चुप, उसने न कोई प्रश्न किया।।
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अगणित मंदिर की चौखट हैं,
जो उसको अब पहचानती हैं।
बस सुखी रहें उसके जाए ,
मां अक्सर प्रभु से मांगती है।।
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‌ मेरे निज घर आंगन में ,
छवि उसकी कुछ यों मिलती है।
जहां प्रेरणा बन आते पिता,
मां संस्कारों में बसती है ।।
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प्रवासी भारतीय, कुवैत

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