घर अपना सब को लगता प्यारा/नंद किशोर परिमल

शीर्षक (घर)
घर अपना सब को लगता प्यारा, बहती इसमें प्रेम की धारा।
ईंट गारे से बनता घर हमारा, प्रेम – संस्कारों से भरता इसका कण कण सारा।
बच्चों की किलकारियों से रौनक इसमें, महमानों से लगता घर है प्यारा।
फुलवारी – क्यारी इसकी प्यारी, हर कोना इसका है जग से न्यारा।
पूर्व जाओ या पश्चिम जाओ, उत्तर से हो कर चाहे दक्षिण जाओ।
लौट के जब घर अपने आते, सहसा कहते घर ही अपना है इक प्यारा।
अपनों में ही मौज है होती, इस सम कोई जग में नहीं कोई नजारा।
खुलकर अपने घर में खेलो, सभी पुकारें घर ही होता है अपना प्यारा।
सदियों से घर प्रेम जुड़ा है, पशु पक्षी भी अपना हैं नीड़ बनाते।
तिनका तिनका जोड़ कर लाते, फिर कितना सुंदर उसे सजाते।
नन्हें बच्चों को पाल-पोस कर, चलना उड़ना फिर उन्हें सिखाते।
चोग चुगने कहीं उड़ बाहर जाते, लौट के फिर हैं अपने घर को आते।
घर बनाने में श्रम है लगता, प्रेम भाव – विचार उसमें भरना पड़ता।
संस्कारों से घर का कोना कोना भर कर, इसे संजोकर रखना पड़ता।
यह सद्गुण जिस घर में नहीं हैं, वह घर तो होता भूत का बासा।
घर को नजर नहीं है लगती, गर हो इससे सब को प्रेम की आशा।
वरन् श्मशान है घर से अच्छा, किसी को नहीं मिलती जहां निराशा।
सब चाहें श्मशान सुंदर स्थान बने यह, बैठ मिले निराश मन को प्रेम दिलासा।
घर तो घर होता है, किस को नहीं लगता घर है प्यारा!
परिमल कहता घर को घर ही रखो, सबको यह मेरा घर अपना घर ही कहने दो।।
नंदकिशोर परिमल, गांव व डा. गुलेर
तह. देहरा, जिला. कांगड़ा(हि_प्र)
पिन. 176033, संपर्क. 9418187358

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