मुहब्बत का वही फिर आशियाना/लक्ष्मण दावानी

मुहब्बत का वही फिरआशियाना ढूंढ लेना है
लबो का फिर पुराना वो तराना ढूंढ लेना है

भटकता ही रहा हूँ गर्दिशों में तेरे चाहत को
पनाहों में तेरी अपना ठिकाना ढूंढ लेना है

खड़ा हूँ आज भी दो राहे पर इंतज़ार में तेरे
तेरे दीदार की खातिर बहाना ढूंढ लेना है

सभीके रहते तन्हाजी रहा हूँ ज़िन्दगी अपनी
तुमारे साथ जीने का खजाना ढूंढ लेना है

न कोई हम सफ़र मेरा न कोई राहे मंजिल है
अकेले इस शहर में आबुदाना ढूंढ लेना है

लगे है दाग दामन पे मेरे जो इश्क में तेरे
उसी के साथ जी कर जगमगाना ढूंढ लेना है
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
19/5/2017
आई – 11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड़ ( जबलपुर म,प्र, )

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