जख्म ही देता रहा लेकिन दवा कुछ भी नहीं
कोशिशें तो लाख की लेकिन हुआ कुछ भी नहीं

हम तरसते ही रहे जो लम्हे पाने के लिये
आ के वो नजदीक बैठे पर कहा कुछ भी नहीं

आग सीनों में मुहब्बत की सुलगती ही रही
पर रहे खामोश दोनों फैसला कुछ भी नहीं

सोहबत में उनके सब कुछ खो दिया हमने यहाँ
हिज्र-ऐ-गम के सिवा हमको मिला कुछ भी नहीं

कुछ दबीसी ख्वाहिशे ज़िन्दा दफ़न है दिलमें ही
अब मगर दिल में रहा वो हौसला कुछ भी नहीं

खुद अदू बन बैठे अपनी मोहब्बत के जाने जाँ
ऐसे तो अपने नसीबो में लिखा कुछ भी नहीं
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
17/5/2017
अदू – बैरी,दुश्मन
आई – 11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड़ ( जबलपुर म,प्र, )

सजदे में सर जो झुकाकर जायेगा
वो खुदा के दर से पाकर जायेगा

साथ जिसने भी दिया सच का यहाँ
हश्र के दिन सर उठाकर जायेगा

मान ले मनवा हैसियत में रह तू अब
वक़्त तुमको ये सिखाकर जायेगा

इस ज़माने की रिवायत पर न जा
ये जहाँ तुमको सत्ताकर जायेगा

लौट कर तो आये है महफ़िल में वो
दर्द दिल का फिर बढाकर जायेगा

हाले दिल अपना सुनाकर बज्म में
पूरे महफ़िल को रुलाकर जायेगा

थम गये सब दर्द के तूफाँ अपने
जाम नज़रो के पिलाकर जायेगा
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
17/5/2017
आई – 11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड़ ( जबलपुर म,प्र, )