विजय मुफ्त में नहीं मिलती है

विजय मुफ्त में नहीं मिलती है मोल चुकाना पड़ता है |
काँटों की सेज पे अपना बिस्तर यार बिछाना पड़ता है ||

निशिदिन टकराना पड़ता है तूफानी झंझावातों से |
पल –पल लड़ना पड़ता है अंधियारी काली रातों से ||
विपरीत हवाओं के रुख में भी दीप जलाना पड़ता है |
विजय मुफ्त में नहीं मिलती है मोल चुकाना पड़ता है ||

कदम – कदम पे पड़े जूझना जाहिल और मक्कारों से |
कदम – कदम पे पड़े खेलना जलते हुए अंगारों से ||
संघर्षों की धरती पे अपना नाम लिखाना पड़ता है |
विजय मुफ्त में नहीं मिलती है मोल चुकाना पड़ता है ||

खुद ही पोंछने पड़ते हैं लुढके आंसू गालों के |
खुद ही सहलाने पड़ते हैं रिसते घाव ये छालों के ||
विचलित होते मन को अपने खुद समझाना पड़ता है |
विजय मुफ्त में नहीं मिलती है मोल चुकाना पड़ता है ||

सबसे ऊँचा दुनिया में निज झंडा फहराने को |
स्पर्श क्षितिज का करने को गीत विजय के गाने को ||
ऊँचे पर्वत की छोटी तक अनथक जाना पड़ता है |
विजय मुफ्त में नहीं मिलती है मोल चुकाना पड़ता है ||

बाधाओं की गहरी खाइयाँ मीलों भंवर के फेरे हैं |
कदम – कदम पे जिधर भी देखो तूफानों के घेरे हैं ||
बीच भंवर से कश्ती को खुद बाहर लाना पड़ता है |
विजय मुफ्त में नहीं मिलती है मोल चुकाना पड़ता है ||

सुख –चैन प्यारे त्याग- त्यागकर रात- रात भर जाग- जागकर |
अवरोधों के कांटे चुनकर समय से आगे भाग – भागकर ||
स्वेदकणों से सपनों का मानचित्र बनाना पड़ता है |
विजय मुफ्त में नहीं मिलती है मोल चुकाना पड़ता है ||

जाल बिछाए बैठे हैं बधिक बहुत जमाने में |
कभी साथ नहीं आता है किसी को कोई छुड़ाने में ||
जाल तोड़कर स्वयम को यारो स्वयं उडाना पड़ता है |
विजय मुफ्त में नहीं मिलती है मोल चुकाना पड़ता है ||

शह – मात का खेल खेलने कई बिसात बिछाए बैठे हैं |
लेकर तीर कमान हाथ में घात लगाये बैठे हैं ||
शतरंजी चालों से दर्द स्वयं को स्वयं बचाना पड़ता है |
विजय मुफ्त में नहीं मिलती है मोल चुकाना पड़ता है ||

अशोक दर्द [बेटी डा. शबनम ठाकुर के साथ-साथ दुनिया की तमाम बेटियों के लिए ]