ग़ज़ल

आओ एक हो जायें अब तो
सपनों में खो जायें अब तो।

दर्द के साथ यह कैसा रिश्ता
जख्म कुछ धो पायें अब तो।

सदियाँ से है आँख न झपकी
घड़ी भर सो जायें अब तो।

नहीं मिला है कोई सहारा
किसी के हो जायें अब तो।

हंसे न हम इस जिन्दगी में
आओ ज़रा मुस्कायें अब तो।

बुरा करना छोड़ दें अब हम
खुद को भी समझायें अब तो।

ईश्वर की सत्ता को मानें
उसमें ही मिल जायें अब तो।

सब अच्छे हैं सब हैं अपने
भेद भाव मिटायें अब तो।

प्यार करें सारी दुनियाँ से
प्यार सभी से पायें अब तो।

बुरे कर्म हम करना छोड़ें
अच्छे कर्म कमायें अब तो।

अपनी करनी है मर्जी उसकी
उसके दर चल जायें अब तो।

कर्म करें और नाम कमायें
मेहनत का ही खायें अब तो।

नफरत से नाता न जोड़ें
प्यार से प्यार बढ़ायें अब तो।

निराश जीना अब कैसा जीना
मौत को गले लगायें अब तो।

सुरेश भारद्वाज निराश
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