माया ठगनी है/नंद किशोर परिमल

शीर्षक (माया ठगनी)
माया ठगनी है कहलाती, मानव का इसने नसीब ही बदला।
उल्टी चलना चाल सिखलाए यह, बड़े बड़ों का मन है इसने बदला।
माया छाया सम है आती जाती, अपने जाल में है सबको फंसाती।
पैर धरती से उठला देती, छिन जाने पर है उसे सताती।
घुन सम जाए मानव इस में पिसता, अपने बस में वह नहीं रहता।
महत्वाकांक्षी बनता माया पाकर, कभी किसी से फिर वह नहीं डरता।
माया कितने है रंग दिखलाती, परसु से परसा और परसराम बनाती।
गुरमीत को धरती से उठला कर, राम रहीम बनना है कैसे सिखलाती।
रावण को दानव बनाती है माया, पथ सब का है भटकाती माया।
सीधे से उल्टे राह चलाती माया, आखिर यमलोक उसे भिजवाती माया।
अर्श से फर्श पर पटकाती माया, भेद है इसका अब तक कोई समझ न पाया।
धरती पर यह टिकने नहीं देती, मानव को दानव बनाती है यह माया।
माया के दास कभी न बनना, यदि तुम्हें है भव सागर यह तरना।
मुंह में राम बगल में छुरी मत रखना, गांठ बांध बात यह मेरी रखना।
दो सांस बीच है यह जीवन अटका, फिर क्यों जाए यह मानव भटका।
यह माया ठगनी बहुत बड़ी है, सांस है सब का इस में अटका।
काम अनोखे यह करवाती माया, बड़े बड़ों को पथ से है भटकाती माया।
जो पथ से अपने भटक गया तो, राजा से रंक बनवाती है यह माया।
एक शख़्स ही इस से बच कर, नारायण नारायण करता जाए।
परिमल वही राह है इक सच्चा, जिस राह पर नारद मुनि है चलता जाए।

नंदकिशोर परिमल, गांव व डा. गुलेर
तह. देहरा, जिला. कांगड़ा (हि_प्र)
पिन. 176033 संपर्क 9418187358

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