///////////-गीत-////////////

गाता हूँ मैं गीत पर सुनता नहीं है कोई,
लिखता भी हूं गीत पर पढ़ता नहीं है कोई ।

कैसे गाऊं कैसे लिखूं कोई तो मुझे वता दो,
मेरी चौखट पर मुझे वताने चढ़ता नहीं है कोई ।

टूट चुके हैं अन्दर के भी मेरे साज सब,
देख अनदेखा करते पर मढ़ता नहीं है कोई ।

कर्कश आवाज फटे साज सुनेगा मेरी कौन,
वेसूरे ताल को आज क्यों जड़ता नहीं है कोई ।

है शौक जिनको सुनें मधुर तान सब,
उसे आगे बढ़ाने लिए आज बढ़ता नहीं है कोई ।

लुप्त हो चले क्यों अपने पुराने संगीत सब,
उन्हें जींवत करने लिए लड़ता नहीं है कोई ।

अपनी संस्कृति के संगीत में भरी है मानवता,
पाश्चात्य में हैं डुबे लोग डरता नहीं है कोई ।

विक्रम समोट चम्बा
(हि०प्र०)
7018479919