काश तुम समझे मुहब्बत/लक्ष्मण दावानी

काश तुम समझे मुहब्बत के इशारे होते
फिर न आँखों में तेरी अश्क के धारे होते

चोट होती न कभी दिल में तुमारे जानम
इश्क में डूबते दरिया के किनारे होते

धीरे धीरे से धुआं उठने लगा चाहत का
आतिशे इश्क के दोनों ही न मारे होते

जुर्म- ऐ- इश्क ने आवारा बना डाला अब
हम कहीं के न रहे वरना तुमारे होते

इश्क के घाव पे होगा न असर मरहम का
दर्द मिट जाते अगर आप हमारे होते

मेरे नग्मो में सदा आप हि होते शामिल
आप भी काश कभी हमको पुकारे होते
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
12/5/2017
आई – 11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड ( जबलपुर म,प्र, )

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