हर इक कदम पे जुल्म के घनघोर साए हैं
लोगों ने अपने चहरो पे चहरे लगाए है

हम मांग कर देखेंगे खुदा से तुम्हे भी यहाँ
उम्मीद की जिगर में लौ अपने जलाए है

हम क्या करेंगे हुजूम देख चाँद तारे का
हम इक हसीन चाँद को दिल में बसाए है

इल्जाम चाहे जितने लगा ले मेरे ऊपर
पूरी वफ़ा से हमने वो वादे निभाए है

क्यों होरहे खफा यूँ मुहब्बत से अपने तुम
हर जख्म खाने साथ जिगरअपना लाए है

तुम शौक से समझ ले पराया मुझे यहाँ
हमने ज़माने को तुझे अपना बताए है
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
11/5/2017
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