इक सिवा तेरे यहाँ हमको मिला कोई नहीं
जब रहे ना साथ तुम मेरे रहा कोई नहीं

हर तरफ फैली बेमानी ही बेमानी है यहाँ
ज़िन्दगी में ज़िन्दगी सा हादिसा कोई नहीं

अब सभी करते मुहब्बत के दिखावे ही यहाँ
ज़िन्दगीमें दिलसे अब करता वफ़ा कोई नहीं

कौंन है इस खांकदा में अब मेरा तेरे सिवा
क्यों ये कहते हो कि तुम से वास्ता कोई नहीं

साय-ऐ-जुल्मत में खो के रह गया हूँ में यहाँ
हिज्र- ऐ -गम की बड़ी इससे सजा कोई नहीं

खार – ओ – पुरसंग की राहो में तन्हा हूँ चला
जो दिखा दे राहें मंजिल रास्ता कोई नहीं
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
10/5/2017
आई -11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड ( जबलपुर म,प्र, )
खांकदा – नश्वर संसार
साय-ऐ-जुल्मत – अंधेरो की परछाई
खार-ओ-पुरसंग – काँटों और पत्थर