अरवों की भीड़/जग्गू नोरिया

अरवों की भीड़ , कैसी देश की तकदीर।
नींद उडाती दौलत, सो न सके अमीर।
पेट की आग कैसी जाने बखूव गरीव।
लुच्चे लफंगे शंहशाह हुये, शरीफ सहे पीड़।
अमीर का कोयला,कहे सब है हीर।
कानून डराता डंडे खाता देख लो गरीव।
सलाह देते मिल जाते यहाँ लाख वजीर।
मदद की गुहार सुन लगती घर सीध।
ऐसा देश भारत मेरा रहते मार ठीस।
बेटा लाट साहब है, बाप माँगता भीख।
दिखावे की दुनिया जीना कैसे है ठीक।
मर जाये वोह जिसने चलाई यह रीत।
बृद्धाआश्रम में माँ को रखना कितना ठीक।
मार दो गोली उसका, हारवा दी जीत।
ऊँचाई नापना धावक की कितनी है ठीक।
नशे में डूवती जवानी , खुश होते सरीक।
लड़की मार, लड़के की चाह कैसे ठीक।
कोढी़ हो जाये डाक्टर नर्स वोह ढीठ।
गर्भपात करके कहे, हो गया सब ठीक।
मरते पल गटर मिले ,सोचते गन्दी तरकीव।
छलावा करे,जाये वोह नरक के समीप।
पुछे ,जग्गू, कहना होकर निर्भीक।
सिर झुकाना हर पल कितना ठीक।।
जग्गू नोरिया

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