जल उठा स्वप्न अंगारों की तरह
टूट के बिखरा सित्तारो की तरह

जिस्म दो इक जानथे हम भी कभी
आज रहते दो किनारों की तरह

रात कटती ही नहीं काली मेरी
घुमते फिरते अवारो की तरह

जल रही अबभी चिता अरमान की
देख रहे तुम भी नजारों की तरह

कट रही है ज़िन्दगी तन्हा मेरी
हो खफा तुम भी हजारो की तरह

आग दिल की मेरे भी बुझा कभी
आ बरस मुझपे फुहारों की तरह
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
5/5/2017
आई – 11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड ( जबलपुर म,प्र, )