कहर पानी का

वदन से नंगे पहले ही थे
अब पेट से नंगे होने लगे हैं
भूख प्यास से दुखी हो गये
अँसुवन गाल भिगोने लगे है।

क्या बिगाड़ा खुदा तुम्हारा
यह दिन हमें क्यूँ दिखलाये
सब कुछ अपना डूव गया है
अपना आपा खोने लगे हैं।

अन्न धन बह गया पानी में
फूस का छप्पर साथ ले गया
वगल तक पानी में खड़े हैं
खड़े खड़े ही सोने लगे हैं।

भूखा पेट क्यूँ रोटी माँगे
बता इसे अब क्या खिलायें
आज हमें नहीं कोई पूछता
दर्द को पानी से धोने लगे है।

पशुधन कहां है नहीं जानते
गहना गट्ठा वहा पानी में
बूढ़ी अम्मा नज़र न आये
याद में उसकी रोने लगे हैं।

कंधे पर बकरी सिर पर गढरी
हाथों में नौनिहाल उठाय
सजा मिली है किन पापों की
किन पापों को ढोने लगे हैं।

निराश सब ओर पानी पानी
भाग्य भी साथ नहीं दे रहा
कुदरत से करके छेड़छाड़ हम
बीज विद्धवंस के बोने लगे है।

सुरेश भारद्वाज निराश
धौलाधार कलोनी लोअर बड़ोल
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