अस्पृश्यता एक कलंक
भारत एक विशाल देश है जहां विभिन्न धर्मों, समुदायों व जातियों के लोग रहते हैं |मगर अधिकतर आबादी हिंदू धर्म मानने वालों की है |हिंदू धर्म विश्व का प्राचीनतम धर्म है जिसमें मानव कल्याण व विश्व कल्याण को सर्वोपरि माना गया |प्रकृति के प्रतीकों वनस्पति व जीव जन्तुओं को भी पूजनीय माना गया |समय बदलने के साथ ही हिंदू धर्म में कई कुरीतियां पनपी जिनमें अस्पृश्यता या छुआ छूत भी एक है |पहले मनुष्य के व्यवसाय के आधार पर मनुस्मृति द्वारा वर्ण व्यवस्था लागू हुई फिर धीरे धीरे यह जन्म के आधार पर जातियां बनने में बदल गई |समाज का समृद्ध व शक्तिशाली समूह हमेशा कमजोरों व दलितों को दबाना चाहता था |इसके परिणामस्वरूप जातिव्यवस्था व सति प्रथा जैसी कुरीतियां पनपी |
धीरे धीरे समाज में जाति व्यवस्था इतनी प्रबल हो गई कि दलित जातियों के लोगों को सार्वजनिक स्थलों, मंदिरों आदि में जाने से वंचित कर दिया गया |उनके साथ खाना पीना, उठना बैठना बंद कर दिया गया |कई जगह तो उनकी परछाई से भी बचा जाने लगा |इस तरह हमने मानव समुदाय के ही एक समूह को अछूत बना दिया |इसी के परिणाम स्वरूप बौद्ध व जैन समुदायों का उदय हुआ |
अंग्रेजी शासन काल में भी स्वामी दयानन्द सरस्वती, राजा राम मोहन राय व महात्मा गांधी जैसे महामानवों ने इस कलंक को मिटाने का प्रयास किया |गांधी जी ने तो इन लोगों को हरिजन नाम भी दिया लेकिन अपेक्षित परिणाम देखने को नहीं मिले |विभिन्न सरकारों ने कानून बना कर अस्पृश्यता को हटाने के प्रयास किये |सर्वप्रथम ब्रिटिश भारत में 1850 के जाति विकलांगता हटाने के अधिनियम XXI (Cast disabilities removal act -XXI) के अन्तर्गत जातिय भेदभाव व छुआ छूत के विरुद्ध कानूनी प्रतिबंध लगाया गया |भारत सरकार अधिनियम 1935 द्वारा अनुसूचित जाति के लोगों को विशेष संरक्षण प्रदान किया गया |जब स्वतंत्र भारत ने संविधान को अंगीकार किया तो सभी नागरिकों को समानता का अधिकार दिया |अस्पृश्यता अधिनियम 1955 द्वारा संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत छुआ छूत को अपराध बनाया गया |1976 में इसका नाम नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम कर दिया गया |1990 में अनुसूचित जाति व जनजाति (अत्याचार निवारण अधिनियम -1989) द्वारा कानून को और कडा किया गया | इस सबके बावजूद समाज में बदस्तूर यह बुराई जारी है |यहां तक कि संविधान निर्माता बाबा साहिब अम्बेदकर ने अपने हजारों अनुयायियों के साथ 14अक्तूबर 1956 को बौद्ध धर्म अपना लिया क्योंकि हिंदू समाज बदलने को तैयार नहीं था |
यह बुरी प्रथा आज भी कायम है |कानून व सजा के डर से समाज में अपेक्षित सुधार नहीं आता |इसके लिए समाज में शिक्षा का है विस्तार व समाज के अंदर से ही इच्छाशक्ति होना जरूरी है |आज शिक्षा के प्रसार व व्यवसायिक गतिविधियों के बढने से शहरी समाज में अस्पृश्यता कम जरूर हुई है लेकिन गांवों में अभी भी हालात वैसे ही हैं |हिमाचल के संदर्भ में भी देखें तो गांवों में यह कुरीति आज भी जारी है |दलितों का मंदिरों के गर्भगृह में जाना वर्जित है, उनके शमशान अलग हैं | उनके साथ बैठ कर खाना पीना नहीं होता आप शादी विवाह या अन्य आयोजनों में खाना खाने के लिए अलग अलग बैठने की व्यवस्था अक्सर देख सकते हैं |दलित को अपने घर के समारोह में तथाकथित ऊंची जाति के लोगों द्वारा खाना बनवाना पडता है |कुछ गांवों में तो दलितों का बरामदे में आना भी वर्जित है |ऊंची जाति की कोई लडकी यदि दलित से विवाह कर ले तो मायके वाले उससे सम्बन्ध तोड लेते हैं |कई बार तो अॉनर किलिंग भी हो जाती है |हमारे प्रदेश में देव संस्कृति का प्रचलन है इसमें भी अस्पृश्यता का बोल बाला है |कई बार सुनने में आता है कि स्कूलों में दोपहर का खाना खिनाने में भी भेदभाव होता है |समाज में सभी बातें उजागर नहीं हो पात लेकिन खेल जारी है |
यदि हमें वास्तव में एक समान व समभाव वाले समाज का निर्माण करना है तो हमें यह कलंक मिटाना ही होगा |कानून अपनी जगह है, समाज को अपने भीतर बदलाव लाना होगा |यदि हम दृढ इच्छाशक्ति से यह काम करें तो जरूर कामयाब होंगे तथा सुंदर समाज का निर्माण कर सकते हैं |आदमी आदमी के साथ बैठकर उसके हाथ का बना न खाये इससे शर्मनाक कुछ नहीं हो सकता |
संजीव कुमार सुधांशु
गांव व डाकघर च्वाई
त. आनी जिला कुल्लू