आस्था का प्रतीक है गढ़ माता मंदिर
प्रकृति की मूक आवाज को सुनना चाहते हैं तो जरुर आईये यहाँ
भारत का खजाना में आज आपको ले चलते हैं गढ़ माता के दर्शनों को आस्था का प्रतीक ये मंदिर जिला चम्बा में हैं इस रिपोर्ट को पत्रिका के author श्री युद्धवीर टण्डन जी ने लिखा है और साथ ही दूसरे हमारे साथी श्री उत्तम चन्द जी ने सहयोग किया है सुंदर तस्वीरों के साथ।

Photo:-Uttam chand


वैसे अगर देखा जाये तो पुरा हिमाचल प्रदेश ही प्रकृति की अद्भुत कृतियों से भरा पड़ा है| न तो यहाँ पर मन्दिरों की कमी है न ही प्राकृतिक पर्यटन स्थलों की और न ही प्रकृतिक सुन्दरता की| प्रकृति ने एसी ही खूबसूरती की छटा बिखेरी है हिमाचल के चम्बा जिला के एक रमणीक स्थल गढ़ माता पर भी|
जम्मू कश्मीर एवं चम्बा (हिमाचल प्रदेश) की सीमा पर स्थित पृथ्वी ज्योत चामुंडा गढ़ माता के मंदिर का नजारा देखते ही बनता है| यह मन्दिर एक ऐसे स्थान पर स्थित है जहाँ पर स्थाई तोर पर कोई बाशिंदे नहीं रहते हैं| और यही बात इस स्थान की खूबसूरती में चार चाँद लगती है, एकांत पसंद लोगों को, जो की अकेले में या अपने परिवार के सदस्यों या फिर कुछ दोस्तों के साथ समय व्यतीत करने के शौकीन होते हैं, यह जगह किसी जन्नत से कम नहीं है| कहते हैं खूबसूरती मंजिल तक पहुंचने में नही बल्कि रास्ते के सफर में होती है| और गढ़ माता का ये सफर भी बहुत सुंदर है| प्रकृति की मूक आवाज को सुनने की जो लोग चाह रखते हैं उन्हें एक बार तो कम से कम यहाँ पर आना ही चाहिए| अपनी सांसारिक आँखों को बंद कर के मन की आँखों से जब यहाँ पर कोई खूबसूरती को तलाशता है तो उसका विरह लम्बा नहीं रहता मंद मंद बयार जब चेहरे को छुती है तो मानो ऐसा लगता है की कोई मोर पंख से चेहरे पर गुग्गुदी कर रहा हो|

कैसे पहुंचे यहाँ पर

मंदिर तक पहुंचने के बहुत से रास्ते हैं सलूनी से, भान्दल से, और तेलका से| यहाँ पर सुबह के समय भी मार्गन (ट्रेकिंग) करते हुए जाया जा सकता है और अगर आप अत्यधिक रोमांच के प्रेमी हैं तो आप रात को भी साजो सामान के साथ मार्गन (ट्रेकिंग) कर सकते हैं| अगर आप यात्रा के लिए तेलका मार्ग का चयन करते हैं तो चम्बा से कोटि पुल के रास्ते होते हुए लचोडी फिर तेलका से दो किलोमीटर दूर डंडी वहां से आगे झोड़ा, और खरेड होते हुए चिउगली नाम के एक ग्राम तक कार से या दो पहिया वाहन से पहुंच सकते हैं निकट भविष्य में यहाँ पर कोई बस भी जाये एसी सम्भावनाएं प्रबल हैं| फिर वहां से शुरू हो जाती है पैदल यात्रा, जैसे जैसे धीरे-धीरे चड़ाई चड़ते जाते है, तो एसा लगता है मानो प्रकृति ने उस जगह पर अपना सारा सौन्दर्य लुटा दिया है| सुन्दरता एसी है जिसे देखते देखते न तो रस्ते की चड़ाई का पता चलता है और न ही समय बीतने का| जहाँ कहीं पर भी रुक कर बात करते हैं थकावट भूल कर प्रकृति की मनमोहक छटा निहारने लगते हैं| दृश्य इतने आकर्षक की ऑंखें हटा कर आगे चलने का मन ही नही करता पर सुदूर पहाड़ी पर विराजमान माता का थान जो की कुछ देर की चढ़ाई से स्पष्ट दिखाई देता है मानो जैसे की हमे अपनी और खींचता है वास्तव में इसे ही प्रकृति का जादू कहा जा सकता है| और बस इस तरह प्रकृति के इस जादू को अपनी यादों में और कैमरे में कैद करते हुए हम आगे बढ़ सकते हैं| खरेड नाले से भी सीधा ऊपर चढ़ते हुए डीभरि गला के रास्ते यहाँ जाया जा सकता है| चम्बा से यहाँ की कुल दुरी 65 किलो मीटर है जिसमें 58 किलो मीटर गाड़ी से और 7 किलो मीटर पैदल यात्रा है| मन्दिर की समुद्र तल से ऊँचाई 10000 फीट के लगभग है|

मन्दिर के सम्बन्ध में प्रचलित कथाएं

माता के मन्दिर के ठीक नीचे एक विश्राम करने का पड़ाव आता है जिसे स्थानीय लोग “रजा का डेरा” कहते हैं इस मंदिर को लेकर एक बहुत ही प्रसिद्ध कहानी भी प्रचलित है, ऐसा मना जाता है की चम्बा के राजा पृथ्वी सिंह को एक स्वप्न पड़ा और माता ने अपनी स्थापना के लिए राजा को आदेश दिए इसीलिए राजा ने यहाँ पर माता का मंदिर बनाया | वहीं एक दूसरी कथा के अनुसार एसा भी माना जाता है की बशोली के राजा जो की हमेशा चम्बा पर अपना कब्जा करने की सोचता रहता था को कड़ी टक्कर देने और पूरे चम्बा पर अपनी नजर बनाए रखने के लिए राजा ने यहाँ पर आपना गड़ बनाया था | इस बात का अनुमान इससे लगाया जा सकता है की आज से लगभग 20-30 वर्ष पहले यहाँ पर लाल रंग के पथरों का एक ढेर मात्र ही था | जिन्हें की रजा द्वारा ही लाया माना जाता है | इस मेले की शुरुआत सन १९४६ (1946) में हुई थी| इसे “चौण्डी की घौड़ी” भी कहते हैं| काफी समय पहले यहाँ पर दोनों राज्यों के पोहाल अपने अपने पशुओं को चराने के लिए आते थे और फिर जब वो सर्दियों में वापिस नीचे की तरफ जाने लगते थे तो आपसी भाईचारे और प्रेम की निशानी के रूप में मिल कर नृत्य करते थे गीत गाते थे और यही आगे चल कर गढ़ जातर के वर्तमान स्वरूप में विकसित हुई है जिसमे दूर दूर से लोग आते हैं और आनन्द का अनुभव लेते हैं|

गढ़ जातर मेला

यहाँ पर वर्ष में एक बार आशिवन (अशौज) महीने की संक्रांत को गढ़ माता जातर नाम से एक पसिद्ध मेला लगता है जहाँ पर 15 से 20 हजार के करीब श्रधालु आते है| यह श्रद्धालु चम्बा, जम्मु, हिमाचल व पंजाब आदि राज्यों के अलग अलग हिस्सों से आते है और माता के मन्दिर में अपनी हाजिरी लगाने के साथ साथ यहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता का भी लुत्फ़ उठाते हैं| बड़े दूर दूर से लोग यहाँ पर या तो अपनी मन्नत मांगने आते हैं या फिर पूरी हुई मन्नत की ख़ुशी में माता से पुनः भेंट हेतु आते हैं| स्थानीय लोग मन्दिर में सांज (गेहूं के आटे की कच्ची रोटी जिस पर तेल लगाया होता है), हलवा, देसी घी, मक्की की फसल व धूप आदि चढ़ाते हैं| यह रंगों का त्यौहार कहा जा सकता है लोग रंग बिरंगे वस्त्र पहन कर आते हैं और माता का दर्शन करते हैं| गढ़ माता के रास्ते में ग्रामीण लोगों की अध्वारियां (अस्थायी रिहायिशें) होती हैं जनमें वो केवल गर्मियों के महीने बिताते हैं ताकि स्वयं भी गर्मी से निजात पा सकें और साथ ही पशुओं को चारा मिल सके| ऐसे में यह जातर उन अध्वारुओं के लिए विशेष महत्त्व रखती है और बड़े चाव से वो सज धज कर जातर में जाते हैं| इस मेले में लोग खाने पीने के सामान की, कपड़ो की, जूतों की, लोहे के ओजारों की, खिलोनों की और अन्य बहुत सी छोटी-छोटी दुकाने लगाते हैं| अतः व्यापार की दृष्टि से भी यह मेला एक विशेष स्थान रखता है| इतने दूर दूर से लोग जोखिम उठा कर सामान यहाँ पर पहुंचाते हैं लेकिन ऐसा माना जाता है की किसी भी दुकानदार को माता के आशीर्वाद से नुकसान नहीं होता बल्कि लाभ ही होता है यह सब लोगों की माता में अटूट श्रधा भी कही जा सकती है और इस स्थान की खूबसूरती का आलम भी की हर साल यहाँ आने वाले लोगों की संख्या बढती ही जा रही है जिससे की व्यापारी लाभान्वित होते है|

श्रधा, आस्था और जज्बे का अद्भुत मेल

यहाँ पर श्रधालुओं के लिए लंगर का भी आयोजन किया जाता है| इसके अतिरिक्त भी मेले में ऊपर एक और लंगर लगा होता है| इसकी सबसे खुबसूरत बात यह है की कैसे यह आयोजक इतनी दूर तक सामान को पहुंचाते होंगे कितनी श्रधा होगी उन के मन में और कितना जज्बा होगा| कुछ श्रद्धालु तो यहाँ नंगे पावं चढ़ाई चढ़ के आते हैं| मन्दिर के पिच्छे स्थित मैदान में माता के और अन्य देवी देवताओं के चेले (गुर) अपना खेल करते हैं (कांपते हैं) जो की स्थानीय मान्यताओं के अनुसार असामान्य बिमारियों से पीड़ित लोगों को उनसे छुटकारा दिलाते हैं| जो कोई भी इस तरह के रोगों से पीड़ित होता है स्वतः ही कम्पन्न करता हुआ किसी चेले (गुर) के पास चला जाता है| इसके पश्चात सुंदर परिधान में स्त्रियाँ व पुरुष वहां पर गोल दायरे में नृत्य प्रदर्शित करते हैं| यह एक बड़ा ही विहंगम दृश्य नजर आता है| और कदम किसी के भी हों थिरक ही जाते हैं|

कब आयें यहाँ

वैसे तो यहाँ पर कभी भी आया जा सकता है लेकिन जो लोग एकांत पसंद हैं उन्हें यहाँ पर गर्मियों के दिनों में आना चाहिए| यहाँ पर आप को ठहरने के लिए ऊपर कोई खास प्रबंध तो नहीं मिलेगा लेकिन आप रात गुजार सकते हैं अपने साथ अपना खाने पीने का समान लेकर ही आयें चूँकि ऊपर कुछ भी मिलने की सम्भावना बहुत ही कम है| आप अपना टेंट लेकर भी यहाँ आ सकते हैं यह टेंट लगाने के लिए के आदर्श स्थान हैं| हालाँकि रास्ते में आपको अध्वारू (वहां पर रहने वाले अस्थाई बाशिंदे) मिल सकते हैं| यह स्वभाव के बड़े ही सरल और सहज होते हैं| यह आपकी मदद कर सकते हैं| और हो सके तो आपको एक आध दिन तह ठहरने का प्रबंध भी कर सकते हैं| इसके अतिरिक्त आप यहाँ पर जातर के दौरान आ सकते हैं जो दो दिवसीय होती है| इस दौरान आपको यहाँ पर काफी चहल पहल दिखाई देगी| आप प्रकृति के नजरों के साथ साथ स्थनीय संस्कृति, रहन सहन, पहनावा, भाषा और अन्य पहलुओं को भी जान सकते हैं|

समर्पण

इस रिपोर्ट को मैं अपने आदर्श डॉ श्री विपिन चंद राठौर जी और श्री राजेश चाड़क जी को समर्पित करता हूँ जिनके साथ न केवल पहली बार मुझे गढ़ माता मन्दिर जाने का सुनहरा अवसर मिला|

इस रिपोर्ट के सारे चित्र और श्री विपिन चंद जी और श्री राजेश चाड़क जी के कैमरों से लिए गये हैं| कुछ चित्र मैंने स्वयं खींचे हैं कुछ इन्होंने|

जय हिन्द …
लेखक परिचय:-

युद्धवीर टंडन (कनिष्ठ आधारभूत शिक्षक रा. प्रा. पा. अनोगा) गावं तेलका जिला चम्बा हि. प्र. पिन कोड 176312 मोब. 78072-23683

इस गांव के निवासी ओर साहित्यकार श्री उत्तम चन्द जी भी इस मंदिर के बारे में कुछ प्रचलित कथाओ का जिक्र करते हैं। भारत का खजाना पत्रिका को कुछ बहुत ही खूबसूरत तस्वीरें उपलब्ध करवाई हैं श्री उत्तम जी ने।

कहते है जब माता प्रकट हुई थी तो यहाँ एक बहुत बड़ी शिला थी ।और ज़ोर दार गरजना के साथ असमानी बिजली उस शिला पर जा गिरी जिससे वो शिला फट गई और उससे माता की त्रिशूल प्रकट हुई। और तब से उस स्थान का नाम ही चंमुडा की शिला हो गया । सथानिये भाषा में इसे चौंडी की घोड़ी से जाना जाता है। जब ये घटना घटी थी उस समय चंबा रियासत में पृथ्वी सिंह राजा का राज्य हुवा करता था । और कहते हैं के राजा उस समय किसी दुसरी रियासत में बंदी थे । तब माता चंमुडा ने राजा को सपने में जा कर दर्शन दिये और कहा के ऐ राजन् यदि तुम मेरा भवन पृथ्थल नाम धार पर बनवा दोगे तो तुमें बंदी से मुक्त करवा दूँगी । राजा ने माता का कहा स्वीकार कर लिया और किसी तरह वहाँ से निकलने में कामयाब हो गया । और सीधा की माँ के बताई जगह की और चल दिया । भांदल किहार के इलाक़े में पहुँच कर लोगों से माँ के बारे में जान कर लोगों को आदेश देकर भवन निर्माण में जुट गया। कहते हैं पहाड़ पर पत्थर की बहुत कमी थी तब राजा ने सियुल नाम नदी से पत्थर पहाड़ पर पहुँचाए बड़ी बात ये हुई के इनको पहुँचाने में सात किलो मीटर लोगों लाईनें लगाई गई । इस तरह पत्थर पहुँचाए गये । माता का एक विशाल भवन बनवाया गया । और इसकी देखरेख के लिए पहरेदार भी नियुक्त किए गये जो निरंतर वहाँ रहते । यहाँ सर्दियों नं बहुत ही ज़्यादा तीस फ़ीट से भी ज़्यादा तक बर्फ़बारी होती है न जाने कैसे वो वहाँ रहते होगे। कहते है मंदिर में सोने चाँदी का भी ख़ूब चढ़ावा होता था । किसी प्रकार की आपदा में ये पहरेदार धुँआ डाल कर राजा तक अपना संदेश देते थे। इस भवन निर्माण के बाद इस स्थान का नाम गढ़ पड़ गया और राजा पृथ्वी सिंह द्वारा बनाने पर पृथी जौत गढ़ माता से भी पुकारा जाने लगा ।


Photo: uttam chand







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