हम दर्द थे हमारे मगर वो दवा न थे
दो जिस्म थे मगर रूह से वो जुदा न थे

मिलके चले थे राहे सफर ज़िन्दगी के हम
वो हम सफर थे हमारे मगर हमनवां न थे

ना जाने क्या खताएँ हुई जो जुदा हुए
कल तक हमारे दोस्त मगर बेवफा न थे

क्या क्या जफाएँ दिलने सही है मेरे यहाँ
शामिल थे जुर्म में वो मगर रहनुमा न थे

वो रहमतो के करते रहे बस दिखावे ही
सजदे किये थे हमने मगर वो खुदा न थे

ता उम्र कर गये बे सदा बोल कर हमें
हम थे लबो पे उनके मगर वो दुआ न थे
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
2/5/2017
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