माँ का जिगर – रोशन चौहान

सरहदों से आई
आज खबर है
लिपटा तिरंगें में
फिर माँ का जिगर है
उठी सियासत में बात
छलकी हैं माँ की आँखें
रौशनी हुई फिर कम है l

नामुमकिन नहीं है फैसला
सरहदों का
उजड़ रहा आंचल फिर
माँ का क्यों है ?

खौला है खून आज फिर
हर शख्स का
सीमा पर खामोश
फिर क्यों माँ का सपूत है ?

टीआरपी की रेस में
दौड़ रहा है मीडिया
आश्वासनों का दौर देखो
फिर चला है l

बलिदान पर उनके
कब तक होगी सियासत
क्या खामोश मेरे वतन की
‘माँएं’ यूँ ही होती रहेंगी ?
रोशन चौहान