भंवर
आगे निकल गया
मां वाप के पीछे चल चल कर
सव से आगे निकल गया ।
देखा जव पीछे मुड कर
पद चिन्ह ही थे
कहीं नहीं थे पथ प्रर्दशक ।
मंजिल के पास हूंआज जव में
मंजिल कहीं नहीं है
न ही कहीं
पद चिन्ह हैं
पथ प्रदर्शक के
क्या जिन्दगी नाम है
इसी उधेड वुन का
कभी पद चिन्हों पर चलना
कभी पद चिन्ह वन जाना
हां! शायद
यही जिन्दगी है ।
डा. कुशल कटोच