लिखी मेरे ही मुकद्दर में खार है शायद
तेरी नज़र में निहाँ कबसे प्यार है शायद

मचलते अरमान दिल में दबाये बैठा हूँ
जफ़ाओ का मेरे दिलपे ये भार है शायद

भुला न पाये दिले जख्म जो मिले उनसे
कदम कदम पे धोखे का गुबार है शायद

वफ़ा के वादे निभाये न जा सके उनसे
नज़र में उन के मुहब्बत बेकार है शायद

बसे है खाब में वो इस कदर अब तक
उसी का इश्क ही मुझपे सवार है शायद

तड़फ बताती है दिलपे मेरे असर उनका
वो दिनका चैन रातों का करार है शायद
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
1/5/2017
आई – 11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड (जबलपुर म,प्र,)