ग़ज़ल/मोनिका शर्मा सारथी

मेरी एक ग़ज़ल आप सब की नजर

ग़ज़ल

किस्तों में तुमने जो दिया उस ग़म को छोड़ कर
मैं एक दिल बनाऊंगी टुकडों को जोड़कर

कुछ इस तरह से टूट के बिखरा मेरा वजूद
बिखरा दिया हो आईना जैसे कि तोड़कर

जिसको खुशी समझ के चले कितनी देर हम
वो ले गया जिगर से लहू भी निचोड़ कर

राह-ए-व़फा कठिन थी मगर हम तो चल दिये
हम आये कायनात की रस्में झिंझोड़ कर

मुझसे मेरा ही शिकवा किया उसने रात दिन
चाहा था जिससे चाहना, शिकवों को छोड़कर।

ये सोच कर वफ़ा से मैं पीछे नहीं हटी
मैं ‘सारथी’ हूँ कैसे चलूं रथ को छोड़कर

मोनिका शर्मा सारथी

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