कदम कदम पे मिले सब गिराने वाले है
खुद आस्तीन में हमने ये सांप पाले है

कभी करेगा करम मुझपे भी मेरा मौला
लगे नहीं दर पे उसके कभी भी ताले है

लगा के जख्म मेरे दिल पे पूछते है वो
हमारे यार के अन्दाज ही निराले है

चुभा जो तीर जिगर में तेरी मुहब्बत का
दिखाई देते उसी के ये आज छाले है

सदा ही करते दिखावा झूठी मोहब्बत का
शहद जुबाँ पे मगर दिल अंदर से काले है

न पाने की , न ही खोने कि फ़िक्र है यारा
हमारे जिस्म में तेरी रूह के उजाले है
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
30/4/2017
आई – 11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड (जबलपुर म,प्र,)