पहाड़ का दर्द ‘

बस्त्र मेरे फाड़ दिए
लूट लिए तूने
अपने एश्वर्य के लिए
कभी चेष्ठा नहीं की
चेंप लगाने की
कर दिए छेद जहाँ चाहा
मेरे शरीर में और
निकाल लिए अनमोल रत्न
जहाँ चाहा तरास दिया
चमड़ी उधेड़ दी मेरी
काट दिया कोई हिस्सा
मेरे अंग अब ढीले पड़ गये हैं
कभी कोई गिर पड़ता है कहीं से
तो पड़ती है तुझ पर आपदा
कष्ट होता है तुझे
क्योंकि उस से
मेरे शरीर को चीर कर बनाया
तुम्हारा रास्ता
अबरुद्ध हो जाता है
तुम पुन: चीरफाड़ करते हो
और यह और अधिक कमजोर हो जाता है
मेरे आवरण के हटने से
शरीर के छिलने से
और तुम्हारे अत्याधिक खिलबाड़ से
प्रकृति भी कुपित हो जाती है
उसकी तपन बढ़ती है
उस तपन से
मैं भी परितप्त हो जाता हूँ
मेरे सर पर चांदी सा
सुशोभित मुकुट भी
पिघलने लगता है
प्यार की सुखद अश्रु धारा
दर्द भरी कुपित अविरल धारा में
हो जाती है परिणत
जल दिशाएँ बदल जाती हैं
तुम्हारी बजह से
मेरे हुए ढीले अंग छिटक जाते हैं
जल बंध जाता है
और फिर छूट जाता
तुझे लीलता बहाता
ले जाता है सब कुच्छ
यह सिलसिला चलता रहेगा
जब तक तुम मुझ से
खिलबाड़ करते रहोगे
तुम अपने किए का दंड भुगतोगे
ऐसे में मैं रहूँ न रहूँ
तुम्हारा अंत निश्चित है I

डॉ. कंवर करतार
‘शैल निकेत’ अप्पेर बड़ोल
धर्मशाला
9418185845