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छोड़ो अपनी अपनी देश सँभालो जी।
करने को है काम बहुत कर डालो जी।।

दुश्मन और गद्दार बहुत हैं अंदर भी।
पहचानो पकड़ाओ और निकालो जी।।

देख गरीबी के कारण ना मौतें हों।
पूंजीपतियो! आओ देखो भालो जी।।

अस्मत अबलाओं की जिम्मेदारी है।
जिम्मेदारी यह भी खूब निभा लो जी।।

नकलें अकलें मारें चाहे टाॅपर हों।
सँभलो उद्यम कर लो अकल सँभालो जी।।

भारत सोने की चिड़ियाँ थी अब भी है।
जन-गण-मन अधि-नायक सारे गा लो जी।।

आजादी-आजादी क्यों चिल्लाते हो।
आज मिली आजादी जश्न मना लो जी।।

अनहोनी होना दुखदाई है भारी।
होनी अनहोनी से सीख सिखा लो जी।।

किस्मत का दरबाजा सम्मुख तेरे है।
जोर लगाकर कुंडी तो खड़का लो जी।।

अपनी धरती अंबर अपना अपना है।
हाथ तिरंगा लेकर के फहरा लो जी।।

आज हिमालय सागर कहते आपस में।
हम भारतवासी हैं जोर लगा लो जी।।

देख ‘नवीन’ कहे क्या अब यह परवाना।
सरहद आज पुकारे शीश कटा लो जी।।

नवीन शर्मा “नवीन”
गुलेर – हिमाचल
176033
?9780958743