घटना मेरे जीवन की
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सबको प्रणाम सबको नमन
बहुत ही दुखी ह्रदय के साथ आज मैं आप सभी के साथ अपने जीवन की सबसे बड़ी घटना शयर कर रहा हूँ । क्योंकि सुख और दुख के बिना यहाँ कोई नहीं होता । सब इससे जुड़े हैं। पर बात ये है कि हम इस सबसे कैसे निकल पाते हैं और क्या सीख लेते हैं ये बात मायने रखती है । इस घटना से मैंने क्या सीखा क्या पाया क्या खोया वही वर्णन कर रहा हूँ । इस घटना की आज नौंवी बरसी है तो दिल किया के आप सब से ये बात शयर करूँ !
बात 14 अगस्त 2008 की है रोज़ की तरह हम उठे और सब नित्य करम कर और कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत किये पूजा पाठ कर बड़ी ख़ुशी से अपने छ: साल के बेटे के साथ घर से अपने ससुराल जा रहा था । बड़ी खुशी से बहुत सारे आरमान लिए हुवे मैं और मेरा बेटा
हसते खेलते जा रहे थे।हमें नहीं पता था कि ये हमारी हँसी मायूसी में बदल जाएगी ।हम एक बस में जा रहे थे बहुत बातें करते बेटा कहता कि में ननीहाल जा के ऐसा करूँगा ऐसा कहूँगा आदि
अपने घर से मात्र तेरह किलोमीटर ही गये थे कि बस रोड से बाहर निकल गई आचनक ये देख कर मैं सीट से खड़ा हो चालक को ये बताने की कोशिश करता कि बस नियंत्रण खो चुकी है पर वो फ़ोन पे बातें करता हुवा और एक दम लोगों की चिखें पुकारें सुनाई दी
तब चालक खिड़की से कूद गया ।

तब क्या हुवा बहुत बूरा न भुलाने वाला वो मंज़र बस में 70 लोग सवार थे। में अपनी दास्ताँ बयां कर रहा हूँ । तब मैंने जीवन में जितना कुछ पाया था देखा था सब इक पल में मेरी आँखों में आ गया ।
और ये कि अब मौत आ गई है और हम बच नहीं पाएँगे । ये सच सामने था पर इससे निकलने का कोई रास्ता नहीं था बस इक तमन्ना थी के अपने बेटे को गले से लगा लूँ और भगवान से फ़रियाद करूँ के मुझे ले ले और बेटे को सुरक्षित कर पर जो हम सोचते हैं वो नहीं होता । जो वो सोचता है वही होता है । वो मात्र पलक झपकते ही हो गया जैसे में अपने बेटे को पकडने झुखा बस बहुत दुर जा चुकी थी में बस गायत्री मंत्र का जाप कर सका था।
बस सात पलटे खा चुकी थी।और हम वेहोश पड़े थे । हम न चिल्लाए थे न हिम्मत छोड़ी थी इस एहसास से कि मरना तो है ही चाहे आज चाए फिर कल। पर उस परमात्मा ने मुझे दूसरा जन्म दे दिया था। और मुझे होश आ गया होश आते हुवे सबसे पहले उस परमात्मा का शुक्रिया अदा किया फिर फ़ोन कर अपने परिवार को सूचना दी फ़ोन मेरे थैले में था और क़िस्मत से वो भी वहीं मिला जहाँ पर में घायल पड़ा था सब उसकी मर्ज़ी है ।
इसके बाद का जो मंज़र देखा वो बयां नहीं कर सकता उठ नहीं सकता था पर उठा अपने बेटे को ढूँढते हुवे कंधे टूट चुके थे सर में चोट थी पूरा शरीर टूट चुका था पर फिर भी बेटे को ढूँढ रहा था उस भयानक मंज़र में गिरता उठता रोता चिलाता सब देख रहा था कुछ घायल थे कुछ दुनियाँ त्याग चुके थे । तो कहीं समान बिखरा है तो कहीं दौलत बिखरी है
बहुत जान पहचान वाले थे । कई दौलत मंद थे कई शोहरत मंद थे
कई ताक़त वाले थे।
मगर वहाँ तो काल आ गया था जो सब ज़िंदगी जीना चाहते थे। मौत कितनी भयंकर है इसका एहसास मौत से मिल कर होता है ।
उस भीड़ में मैं अपने बेटे को नहीं ढूँढ सका ।
उस हादसे में मेरा बेटा मुझे छोड़ कर चला गया और न मिटने वाला इक दर्द दे गया।
दोस्तों अब मेरे पास न ख़ुशी थी न ग़म था पास होकर भी उसे न बचा सका क्योंकि मैं ख़ुदा नहीं था ।
इस हादसे से क्या मिला वही बताने जा रहा हू्ं।
इन्सान को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए । और न ही किसी चीज़ पर कोई घमंड करना चाहिए मेरा तेरा सब यहीं रहता है मौत के उस पल में इन्सान किसी से बात तक भी नहीं कर पाता । चाए जो हो वो मंज़र वो दर्द तो मैं नहीं भुल पाता हूँ मगर ख़ुश रहता हूँ और दुसरों को खुश रखने की कोशिश करता हूँ । ये बहुत बड़ा दर्द है पर इसे भुलाने के लिए कभी भी किसी नशली वस्तु का सेबन तक न किया । उस परमात्मा में ध्यान लगा ये मन समझाया । दोस्तो दर्द किसी भी नशे से नहीं मिट सकते वो इतने सस्ते नहीं है अत: किसी भी दर्द में या किसी भी चाह में इनका सेबन न करें।
विचार तो संस्कार तो थे पर कुछ तमन्नाएँ थी । जो इस हादसे के बाद मौत से मिल कर बदल गई।

“अब कोई तमन्ना नहीं महल पाने
की न गाड़ी न नाम कमाने की बस तमन्ना है तो हर दिल में बस जाने की..!

अब जीता हूँ जैसे हूँ ही नहीं
बस यही तमन्ना लिए के जब कर रहूँ कुछ ग़लत न करूँ ।
क्योंकि जीवन सुरक्षित है तो हम किसी तरह इसका यापन कर सकते हैं । वो कहते हैं न जिसने दातँ दिये वो दाने भी देगा । तो जीवन का होना बड़ी बात है । हर हाल में ख़ुश हो जीना चहिए।
कभी कभी हम सोचते हैं जब उदास होतें हैं तो इक ही तमन्ना होती है के मर जाऊँ आत्म हत्या कर लूँ अब में ये नहीं सोचता चाहे कुछ भी हो उस परमात्मा का दिया जीवन बहुत खुबसुरत होता है। इसकी खुबसुरती मैंने मौत से मिल कर जानी है । तो कभी भी किसी भी हाल में हमें संतुष्ट रहना चाहिए।
मेरे जीवन की भी बहुत सारी तमन्नाएँ थी जो मौत से मिल कर वो भी न रहीं । अब जीता हूं बिन किसी फ़िक्र के बिन किसी चाह के
सब काम करता हूँ अपनी रोज़मर्रा के और ख़ुश रहने की कोशिश करता हूँ ।ये सुख दुख इन्सान के जीवन में यूँ ही चलते रहेंगे कहानियाँ यू्ंँ ही बनती रहेंगीं ।

मुझे लेखन में बहत रूची थी बचपन से पर हादसे की बजह से आठ साल कुछ न लिख सका ।
लेकिन आप सभी के अशीष व प्यार से कुछ कोशिश कर पा रहा हूँ ..! और जी रहा हूँ ।
इस प्रकार के हादसों पर लगाम लगनी चाहिए लापरवाह दोषियों को सज़ा मिलनी चाहिए । और नयालय में भी इस तरह के सचाई लिए मुक़दमों का निपटाया जल्दी होना चाहिए ।
आज नों साल हो गये इस हादसे को और इससे संबंधित मुक़दमा आज भी उच्चतम नयालय में विचाराधीन पड़ा है।
ये मेरे साथ घटित घटना थी जो आप सबके साथ शयर की ं ।
आप सबको सादर नमन,,,

कुछ पंक्तियाँ अपने दिवंगत बेटे के नाम..

“कहाँ चले गये,
तुम उदास मत होना
बहुत याद करता हूँ मैं..!

हर जन्म तुम मेरे होना
ये फ़रियाद करता हूँ मैं,
तुम सदा ज़िन्दा रहोगे दिल
में मेरे ये विश्वास करता हूँ मैं..!

देखकर तस्वीर तुम्हारी तुम्हारे
होने का एहसास करता हूँ मैं..!

जहाँ भी हो ख़ुश रहना बेटे
ये पापा बहुत याद करता है तुम्हें
जब से तुम बिछड़ गये
दर्द का पहाड़ उठाए
फिरता हूँ मैं…..!

तस्वीर को तुम्हारी गले लगाए
फिरता हूँ मैं…!


उत्तम सूर्यावशी
किहार चंबा हिमाचल