जश्न ए आज़ादी

सोच था जश्न-ए आजादी पर
गाएंगे अफ़साने आजादी के
मुबारक दिन है आया
तन मन में देश प्रेम हिलोरें ले रहा..
पर…
दर्जनों शिशुओं की मौत साल रही है
रह रह कर…
कैसा जश्न आजादी का..
उन अभागी माँओं के बिना
जिनकी सूनी पथराई आंखों में है उनके लाल का चेहरा ..

नहीं अधूरी है हमारी ये आजादी..
बेमानी है ये जश्न
आज़ाद होना होगा हमें
इस आत्मकेन्द्रता से
केवल खुद को सही ठहराने से

सुध लेनी होगी हर एक उस भारतवासी की
जिसका हक है आजादी का जश्न…

तब तक निर्दोष लाशों पर आज़ादी का जश्न मुझसे न मनाया जायेगा..
व्यथित हूँ.. दुखी हूं…
जलते चिरागों को यूं बुझते देख…
दीपा कायथ