ग़ज़ल/लक्ष्मण दावानी

कही सच्चाई महज ये बखान थोड़ी है
जमी है पांव तले आसमान थोड़ी है

हुआ है दिल मेरा घायल दिखे निशाँ कैसे
चला है तीर नज़र का कमान थोड़ी है

सड़क बनी है बिछोना है छत बना अम्बर
है आशियाँ फुटपातो पे मकान थोड़ी है

दिखाई दे रही जो तुम्हे चलते हुए जो
महज ये लाश है इसमें वो जान थोड़ी है

मिटा चुके है मुहब्बत कोअपने दिलसे हम
ये इश्क का दिल पे कोई निशान थोड़ी है

न मिल सका जो यहाँ वो कही पे तो होगा
तेरा शहर है ये पूरा जहांन थोड़ी है
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
27/4/2017
आई – 11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड (जबलपुर म,प्र,)

4 comments

    1. नावाजिशो का तहेदिल से शुक्रिया आदरणीय बहुत आभार

    1. नावाजिशो का तहेदिल से शुक्रिया आदरणीय बहुत आभार

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