तेरी याद में

उनको देखे हुए ज़माना हो गया है,
समझता नहीं दिल समझायें कैसे,
कसम उनके कदमों के बाकी निशां की
विना उनके राहें अब बीरां हो गयी हैं।

कभी जब वोह मिलते थे इन रास्तों पे,
कुछ मुस्कराते कुछ नज़रें चुराते,
चलते थे वोह कुछ इस अंदाज़ में,
वोह नज़रे-इनायत महमां हो गयी है।

उनकी पलकों में अजब सा खुमार था,
उनके चेहरे की रंगत लाजबाव थी,
होंठों की थिरकन थी शर्मसार सी,
वोह गालों की लाली कहां खो गयी है।

बदल राह क्यूं दी अब मेरे यार ने,
इस कद्र वोह दूर हमसे क्यूं हो गये,
यूं तड़पेंगे कब तक हम दीदार को,
एसी भी क्या हमसे खता हो गयी है।

अब जाने ही बाले हैं हम तेरे चमन से,
है कुछ रार तो आ मेरी बीरानियों में,
कुछ उलझे हैं एसे जज्जबात में हम,
कि आँंखें भी अपनी परेशां हो गयी हैं।

अब भी न आये तो यह जान लेना,
तम समझे नहीं हम समझा सके न,
कहने को “निराश” रहा कुछ नही,
खुद दिल की हकीकत व्यां हो गयी है।

सुरेश भारद्वाज निराश
धौलाधार कलोनी लोअर बड़ोल
पीओ. दाड़ी धर्मशाला हिप्र.
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