बाल कविता
बंद हो जा तूं वर्षा रानी
डा प्रत्यूष गुलेरी
बंद हो जा तूं वर्षा रानी
करती हो यों क्यों मनमानी?
दिन भर पढ़ना लिखना होता
पल भर कोई खेल न सकता
शाम लिए मैं रैकेट आई
खेलूंगी थी दौड़ लगाई
आ गई ले कर पानी पानी
बंद हो जा तूं वर्षा रानी।
मन मेरे की तो मन में रह गई
खुशी धम धड़ाम सी ढह गई
छेड़ें नाना गुनगुन खेलो
नहा कर नंगा मौजें ले लो
न घर मम्मा अरु न घर नानी
बंद हो जा तूं वर्षा रानी ।
अंबर पर हैं बादल बादल
दौड़ रहे हैं हो कर पागल
अज़ब नजारा देखो आशा
वर्षा के संग धूप-तमाशा
इंद्रधनुष सतरंगी तानी
बंद हो जा तूं वर्षा रानी।
यक
कीर्ति कुसुम,सरस्वती नगर
पो दाड़ी-176057
धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश)