ज़िंदगी ?

मुस्कान अब किसी की ग़ुलाम लगे है ।
ज़िंदगी नहीं अब आसान लगे है ।।

सूरज चाँद सितारों पे है पहरेदारी ।
बहुत कुछ उनपे इल्ज़ाम लगे है ।।

सच है धरती अंबर का कोई धर्म नहीं ।
इंसान आपस में नमक हराम लगे है।।

ईसा सलीब पे राम – कृष्ण बनचारी ।
बुद्ध घर त्यागे आराम लगे है ।।

तूँ झेल झंझटों में डूबा ऊबा अनिल ।
ज़िंदगी यूँ ही अब तमाम लगे है ।।

? सुप्रभातम् ?
? पं अनिल ?
अहमदनगर महाराष्ट्र
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