नज़र जब खाब पलती है कभी अपनी कभी उनकी
मुहब्बत हाथ मलती है कभी अपनी कभी उनकी

लगाये घाव मिल के जब रकीबो संग अपने तो
मसर्रत आह भरती है कभी अपनी कभी उनकी

ले कर अंगड़ाई जब भी सामने वो आते है मेरे
तभी नीयत फिसलती है कभी अपनी कभी उनकी

खलिश दिलकी उत्तरआये नज़रमें जब किसीके तो
मुहब्बत दिल में जलती है कभी अपनी कभी उनकी

मिलावट हो जफ़ाओं की मुहब्बत में किसी के जब
सुखन दिलसे निकलती है कभीअपनी कभी उनकी

सिमट कर रह गई हर आरजू दिल की मेरे दिल में
मिटा दी दिल कि हस्ती कभी अपनी कभी उनकी
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
24/4/2017
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